Kama Sutram (कामसूत्रम्)
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| Author | Dr. Ramanad Sharma |
| Publisher | Chaukhamba Sanskrit Series Office |
| Language | Sanskrit & Hindi |
| Edition | 2024 |
| ISBN | 978-81-218-00167-2 |
| Pages | 1180 |
| Cover | Hard Cover |
| Size | 14 x 4 x 21 (l x w x h) |
| Weight | |
| Item Code | CSSO0007 |
| Other | Dispatched in 1-3 days |
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कामसूत्रम् (Kama Sutram) परम्परा से माना जाता है कि प्रजापति ब्रह्मा ने मानवजीवन को नियमित और व्यवस्थित बनाने के उद्देश्य से, त्रिवर्ग के साधनभूत, एक लाख अध्यायों वाले एक शात्र का प्रवचन किया था। इस सुविशाल संविधान के सहारे से मनु ने ‘मनुस्मृति’ की रचना की, बृहस्पति ने बार्हस्पत्य अर्थशास्त्र की रचना की और महादेव के अनुचर नंदी या नन्दिकेश्वर ने कामविषयक अंश को पृथक् कर कामसूत्र की रचना की। इन तीनों आचार्यों ने वस्तुतः उस संविधान का पृथकरण किया जिससे उनकी रचनाएँ भिन्न नामों से प्रचलित हुई।नन्दिकेश्वर के कामसूत्र में एक सहस्र अध्याय थे। उद्दालक के पुत्र श्वेतकेतु ने पाँच सौ अध्यायों में उसका संक्षेप किया। इसके पश्चात् पांचालनिवासी आचार्य बाभ्रव्य ने इस शाख को साधारण, साम्प्रयोगिक, कन्यासम्प्रयुकक, भार्याधिकारिक, पारदारिक, वैशिक और औपनिषदिक-इन सात अधिकरणों में विभक्त कर, एक सौ पचास अध्यायों में उसका संक्षेप किया।नन्दिकेश्वर से लेकर बाभ्रव्य तक कामशास्त्र एक अखण्ड परम्परा के रूप में विकसित हुआ, किन्तु माधव्य द्वारा अधिकरणों में विभत कर देने और अधिकरणविशेष को अधिक माँग होने पर परवर्ती आचार्यों ने एक एक अधिकरण को लेकर स्वतन्त्र चिन्तन-मनन प्रारम्भ किया और उन पर स्वतन्त्र ग्रन्थों की रचना होने लगी।
पटना की वेश्याओं के अनुरोध पर आचार्य दत्तक ने वैशिक भाग का स्वतन्त्र सम्पादन किया। तदनन्तर चारायण ने साधारण को, आचार्य सुवर्णनाभ ने साम्प्रयोगिक को, आचार्य घोटकमुख ने कन्यासम्प्रयुक्तक को, आचार्य गोनीय ने भार्याधिकारिक को, आचार्य गोणिकापुत्र ने पारदारिक को और आचार्य कुसुमार ने औपनिषदिक को बाभ्रव्य के शाख से पृथकू कर उसका स्वतन्त्र विकास एवं सम्पादन किया। इन खण्डग्रन्थों में अलग अलग वर्गों को रुचि होना स्वाभाविक थी। उदाहरणार्थ, वेश्याओं को वैशिक से हो प्रयोजन था, तो नवविवाहित दम्पति साम्प्रयोगिक में विशेष रुचि लेते थे। उच्छृंखल और निर्मर्याट पुरुषों के लिए पारदारिक हो सर्वस्व था, तो मंगेतर कन्यासम्प्रयुवक को ही महत्व देते थे। इस प्रकार बाध्रव्य का शाल अत्यधिक विशाल होने के कारण उपादेय नहीं था और अन्य खण्डग्रन्यों में विषय का सांगोपांग विवेचन उपलब्ध नहीं था, अतः महर्षि वात्स्यायन ने समाज की आवश्यकता को ध्यान में रखकर संक्षिप्त एवं पूर्ण शास्त्र की रचना का प्रयास किया। इसे उन्होंने स्वयं ही स्वीकार किया है ‘सर्वमर्थमल्पेन ग्रन्थेन कामसूत्रमिदं प्रणीतम्।’ (१.१.१४)
‘कामसूत्र’ : विषयवस्तु इस ‘कामसूत्र’ की रचना अधिकरणों में हुई है। प्रत्येक अधिकरण अनेक अध्यायों में विशक हुआ है और प्रायेक अध्याय में एक या अनेक प्रकरण संगृहीत किये गये हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण ‘कामसूत्र’ में ७ अधिकरण, ३६ अध्याय ६४ प्रकरण और १२५० सूत्र या श्लोक हैं। ‘कामसूत्र’ मूलतः सूत्रों में रचा गया था, किन्तु वात्स्यायन ने कुछ स्लोकों की रचना भी की है और कुछ आनुवंश्य श्लोक उद्धृत भी किये हैं।








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