Kavya Mimansa (काव्यमीमांसा 1-5 अध्यायः)
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| Author | Dr. Chandramauli Dwivedi |
| Publisher | Bharatiya Vidya Sansthan |
| Language | Sanskrit & Hindi |
| Edition | 1st edition |
| ISBN | - |
| Pages | 114 |
| Cover | Paper Back |
| Size | 12 x 2 x 19 (l x w x h) |
| Weight | |
| Item Code | BVS0104 |
| Other | Dispatched in 1-3 days |
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काव्यमीमांसा 1-5 अध्यायः (Kavya Mimansa) प्रथम अध्याय “अथातः काव्यं मीमांसिष्यामहे” से आरम्भ है। इस प्रकार ग्रन्थ का आरम्भ दर्शनशास्त्रों में मिलता है प्रारम्भ का अर्थ शब्द ओंकार के समान पवित्र एवं मङ्गलवाचक माना गया है तथा इसके बाद अतः शब्द अधिकारसूचक जैसे – अथातो ब्रह्मजिज्ञासा, अथातो धर्मजिज्ञासा आदि। इस अध्याय में काव्य का सम्बन्ध श्रीकण्ठ एथ परमेष्ठी से किया गया है। सर्वप्रथम श्रीकण्ठ ने इस काव्यका उपदेश अपने शिष्यों में किया है। प्रायः अनेक शास्त्र उनकी अनादि-परम्परा को कायम रखने के लिए ब्रह्मा या शिय से ही प्रोक्त दिखलाये गए हैं। इससे इनकी प्रामाणिकता भी सिद्ध होती है। इसके बाद शिःय परम्परा का क्रम चलता है इसे गुरुपर्वक्रम कहा जाता है।
इसकी प्रामाणिकता का दूसरा आधार वेद से सम्बन्ध स्थापन है। इसके बिना शास्त्र अवैदिक होने से उपेक्षित भी माने जाते हैं। अतः काव्य का प्रथम दर्शन वेदों में ही माना गया है। छन्दोमयी वाणी अपौरुषेय वेद में ही सर्वप्रथम उपलब्ध होने से वेद भी काव्य ही है। ये बातें अतिरिक्त हैं कि उसकी नीरसता, अर्थकर्कशता को समझकर ग्रन्थकार ने काव्य का साहित्यविद्या वधू से सम्बन्ध कराकर उसे सरसता प्रदान की है। सभी आख्यानक सारगर्भित एवं विषय-वस्तु के समर्थन में पूर्ण क्षम दीख पड़ते हैं।
प्रथम अध्याय का नाम शास्त्र संग्रह है सर्वप्रथम श्रीकण्ठ से परमेष्ठी आदि चौसठ शिष्यों में काव्यका उपदेश दर्शाया गया है इसके बाद परमेष्ठी ब्रह्मा का अयोनिज अपने शिष्यों में काव्य का उपदेश दिखलाया गया है, उन शिष्यों में काव्यपुरुष सारस्वतेय भी एक है जो देवताओं से भी वन्दनीय है। ब्रह्माने उसे काव्यप्रचार के लिए नियुक्त किया। काव्यपुरुष ने दिव्यविद्यास्नातकों को अष्टादशाधिकरणी काव्यविद्या का उपदेश विस्तार से किया। उन बठारहों अधिकरणों में सहस्त्राक्ष ने कविरहस्य अविकरण, उक्तिगर्भ ने औक्तिक, सुवर्णनाभने रीतिनिर्णय, प्रचेता ने आनुप्रासिक, यमने यमक, चित्राङ्गद ने चित्र, शेष ने शब्दश्लेष, पुलस्त्य ने वास्तव, औपकायन ने औपम्य, पराशर ने अतिशय, उतथ्य ने अर्थश्लेष, कुवेर ने उभयालङ्कारिक, कामदेव ने वैनोदिक भरत ने रूपकनिरूपण, नन्दकेश्वर ने रसाधिकारिक, धिषण ने दोषाधिकरण, उपमन्यु ने गुणी पदानिक, तथा कुचमार ने औपनिषदिक अधिकरण का सम्यम् ज्ञानकर उनकी रचना की।
इस प्रकार प्रकोणं वे विषय कुछ उच्छिन्न हो गए। सभी को संगृहीत कर ग्रन्यकार ने मध्धदशाधिकरणो का प्रणयन किया है। इस प्रकार अष्टादशाधिकरणी काव्यमीमांसा का पहला अधिकरण मात्र उपलब्ध होता है जो कविरहस्य है, इसको अठारह अध्यायों में, शास्त्र संग्रह, शास्त्रनिर्देश, काव्य पुरुषोत्पत्ति, पदवाक्यविवेक, पाठप्रतिष्ठा, अर्थानुशासन, वाक्यविधि, कविविशेष, कविचर्या, राजचर्या, काकुप्रकार, शब्दार्याहरणोपाय, कविसमय, देशकालविभाग तथा भुवनकोष विषयवस्तु वर्णित है। इन पन्द्रह विषयों को अठारह अध्यायों में दर्शाया गया है।





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