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Lalitkala ke Adharbhut Siddhant (ललितकला के आधारभूत सिद्धांत)

270.00

Author Dr. Minakshi Kaslival "Bharti"
Publisher Rajasthan Hindi Granth Academy
Language Hindi
Edition 9th edition, 2021
ISBN 978-93-90571-96-3
Pages 337
Cover Paper Back
Size 18 x 2 x 24 (l x w x h)
Weight
Item Code RHGA0163
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Description

ललितकला के आधारभूत सिद्धांत (Lalitkala ke Adharbhut Siddhant) सामान्यतया कला के आधारभूत सिद्धान्तों और कला-तत्त्वों से सम्बन्धित जानकारियों का सामान्य जन में नितान्त अभाव देखा जाता है। साथ ही इस विषय से सम्बन्धित पुस्तकों की उपलब्धता भी अति सीमित है। जो भी पुस्तकें उपलब्ध हैं, वे या तो अंग्रेजी भाषा में हैं और प्रायः ही वे विदेशी कला-विद्वानों द्वारा लिखी गयी हैं। कला विद्यार्थियों को इन पुस्तकों की या तो जानकारियाँ नहीं होती हैं अथवा वे इनका अध्ययन करने में अपने को असमर्थ पाते हैं। हिन्दी भाषा में इस विषय की सम्पूर्ण पुस्तक उपलब्ध न होने के कारण विद्यार्थियों को अत्यन्त कष्टकर स्थिति का सामना करना पड़ता रहा है।

प्रस्तुत पुस्तक इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर लिखी गयी है। विशेष रूप से कला के विद्यार्थियों व कला-जिज्ञासुओं को दृष्टि में रखकर, जिससे कि वे कला के आधारभूत सिद्धान्तों व कला तत्त्वों का सामान्य परिचय प्राप्त कर सकें।

इस पुस्तक को तीन खण्डों में तैयार किया गया है। पुस्तक का प्रथम खण्ड (अ)-कला मनीषियों द्वारा दी गयी कला की परिभाषाओं, कलाओं के वर्गीकरण, विभिन्न कला-शैलियों और कला की सृजन-प्रक्रियाओं का परिचय देता है। पुस्तक का द्वितीय खण्ड (ब)-कला के सिद्धान्तों व कला-तत्त्वों से परिचय कराता है तथा पुस्तक का तृतीय खण्ड (स)-भारतीय मूर्तिकला के इतिहास का संक्षिप्त परिचय देता है।

पुस्तक को रोचक व बोधगम्य बनाने के लिये यथा-स्थान रेखा-चित्रों का प्रयोग किया गया है, साथ ही चित्र-सूची भी उपलब्ध करायी गयी है जिससे विद्यार्थी विषय को सरलतापूर्वक समझ सकें। पुस्तक की भाषा को भी यथासम्भव सरल और रुचिकर बनाने की भरपूर कोशिश की गयी है।

मैं उन समस्त विद्वान लेखकों के प्रति अत्यन्त कृतज्ञ हूँ, जिनके ग्रन्थ व पुस्तकों के माध्यम से प्रस्तुत पुस्तक के लिये सन्दर्भ एकत्रित किये गये हैं। सन्दर्भ ग्रन्थों का उल्लेख पुस्तक के अन्त में किया जा रहा है। स्वयं मुझे भी इन सन्दर्भ ग्रन्थों के माध्यम से विषय को गहराई से समझने में सहायता मिली है। मैं उन सभी महानुभावों के प्रति भी अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करना चाहती हूँ, जिन्होंने इस पुस्तक की तैयारी में मुझे सहायता प्रदान की है, विशेष रूप से डॉ. आर. डी. सैनी, निदेशक, राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर को, जिनकी आद्य- प्रेरणा से ही यह कार्य सम्पूर्ण हो सका।

मैं आशा करती हूँ कि पुस्तक के रूप में मेरा यह प्रथम प्रयास कला-विद्यार्थियों, कला- जिज्ञासुओं तथा साधारण जन को प्राथमिक मार्ग-दर्शन कराने में सहायक सिद्ध होगा। यह प्रयास अन्तिम प्रयास नहीं है, वरन् इसमें समय-समय पर कला सम्बन्धी नवीन जानकारियों का समावेश किया जाता रहेगा और इसे यथासम्भव श्रेष्ठ से श्रेष्ठत्तर बनाने का प्रयास कि जाता रहेगा। इसी दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए इस संशोधित संस्करण के द्वितीय क्षेत ‘ब’ के अन्तर्गत नेट की परीक्षा देने वाले कला के विद्यार्थियों के लिए अत्यन्त उपयोगी सामी उपलब्ध कराई जा रही है जो उन्हें नवीन दृष्टि प्रदान करने में सर्वथा समर्थ होगी।

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