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Melapak Dipika (मेलापक दीपिका)

96.00

Author Dr. Shree Kamala Kanta Thakur
Publisher Bharatiya Vidya Prakashan
Language Sanskrit & Hindi
Edition 1st edition, 2017
ISBN -
Pages 221
Cover Paper Back
Size 13 x 0.5 x 21 (l x w x h)
Weight
Item Code TBVP0063
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Description

मेलापक दीपिका (Melapak Dipika) प्रस्तुत मेलापक दीपिका त्रिष्कन्ध सिद्धान्त संहिता होरा ज्योतिष शास्त्र सागर की “बहुजन हिताय बहुजन सुखाय” रूप में एक अमूल्य निधि है। इसमें पूर्वाचार्यों द्वारा विभिन्न मतों से प्रतिपादित तथ्यों का उल्लेख किया गया है। इसकी उपादेयता सनातन धर्मानुरागियों में वर कन्या के पाणिग्रहण समय में ग्रह नक्षत्र गणना के अवसर पर आवश्यक हुआ करती है। इसमें वर कन्या की जन्म कुण्डली से जन्म नक्षत्र या पुकारू नाम से नक्षत्र ज्ञान द्वारा वर-कन्या (दोनों) की जन्म कुण्डली के आधार पर ग्रह गणना तथा नक्षत्र मेलापक गणना करने की परिपाटी परम्परा से विद्यमान है। जिसके आधार पर विवाह पूर्व दाम्पत्य प्रीति, सौभाग्य, सन्तान, आयु तथा भाग्य आदि का विचार ग्रह नक्षत्र के बलाबल के अनुसार गणना कर एक दूसरे को आजीवन परिणय सूत्र में बांधते हैं। इन ग्रह नक्षत्रों के विचार कैसे किए जाएं, गणना के आधार पर इनके परिणाम क्या होंगें, इन्हीं तीन प्रकरणों को ध्यान में रखते हुए बोधगम्य तरीके का अनुसरण कर ३ प्रकरणों से इस दीपिका को प्रज्ज्वलित करने का यथासंभव प्रयास है।

आशा है, मेरे किए गये शास्त्रमंथन से प्राप्त सुधा लोकोपकारार्थ सार्थकता का स्थान अवश्य प्राप्त करेगी। मेरे इस प्रयास पूर्ति की सराहना के पात्र हजारीबाग इमलीकोठी के धर्मानुरागी समाजसेवी श्री कृष्ण कुमार पाठक जी लोकोपकारार्थ सतत प्रयत्नशील एवं दक्षता प्राप्त कर्मठ स्वनाम धन्य श्री लम्बोदर पाठक जी तथा सद्विवेक विचार विनय सम्पन्न श्री माधोराम अग्रवाल जी हैं जिन्होंने अपनी सत्प्रेरणा एवं मेरे लिए सर्वथा योग क्षेम की सुव्यवस्था करते हुए मुझे जिज्ञासु समाज हेतु इस दीपिका को उपस्थापित करने की शक्ति दी है। साथ ही मैं अपने सहयोगी श्री प्रमोद कुमार जी साहित्याध्यापक एवं पं. श्री रवीन्द्रनाथ पाण्डेय जी वेदाध्यापक, राजकीय संस्कृत विद्यालय, हजारीबाग को अपना स्नेह-सुमन प्रदान करता हूँ। इससे पूर्व प्रथम-पुष्पाजंलि “ज्योतिष-बोध 1-भारतीय-कुण्डली- विज्ञानम” के प्रकाशक, भारतीय-विद्या-प्रकाशन- वाराणसी के परिवार धन्यवादार्ह हैं, जिन्होंने पुनः द्वितीय पुष्पाजंलि इस दीपिका के प्रकाशनार्थ मुझे अनुगृहीत कर प्रोत्साहन देने का अवसर प्रदान किया है। अन्त में मेरे बुद्धि-दोष, तथा कण्टक जनित दोष से दीपिका में त्रुटि को अपनाकर सुजन वर्ग स्वयं सुधार लेने तथा क्षमा प्रदान की शक्ति सुरक्षित रखेंगे।

तुष्यन्तु सुजनाः बुद्ध्वा विशेषान् मदुदीरितान्।

अवोधेन हसन्तो मां तोषमेष्यन्ति दुर्जनाः।।

 

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