Motapa Ki Prakritik Chikitsa (मोटापा की प्राकृतिक चिकित्सा)
₹25.00
| Author | Dharma Chand Saravagi |
| Publisher | Sarv Sewa Sangh Prakashan |
| Language | Hindi |
| Edition | 18th edition |
| ISBN | 978-9383982-67-7 |
| Pages | 64 |
| Cover | Paper Back |
| Size | 14 x 2 x 22 (l x w x h) |
| Weight | |
| Item Code | SSSP0096 |
| Other | Dispatched in 1-3 days |
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मोटापा की प्राकृतिक चिकित्सा (Motapa Ki Prakritik Chikitsa) आज सारी दुनिया मानती है कि मोटापा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। मनुष्यका शरीर बेडौल हो जाता है, उसे चलने-फिरनेमें कष्ट होता है। आरम्भमें मनुष्य स्वयं अपनी जिल्ह्वापर काबू न कर अधिक खाता है। घरके लोग भी उसको गोल-मटोल देखकर प्रसन्न होते हैं। पर जब उन्हें बीमारियाँ घेरती हैं तब उन्हें अपनी भूलका पता लगता है। फिर चिकित्सकोंके चक्कर में पड़कर दवाइयोंद्वारा मोटापेसे छुटकारा चाहते हैं किन्तु वे तो फँसते ही चले जाते हैं।
मोटा आदमी एक विचित्र जीव होता है, जो कदम-कदमपर जोखिम उठाते हुए भी अपनी जानपर, खेलकर बिना जरूरत मानो बोझ अपने शरीरपर लादे हुए इस जगती-तलपर विचरण किया करता है। उस अनावश्यक बोझसे उसको लाभ कुछ भी नहीं होता और हानि शत-प्रतिशत होती है। ‘खाओ, पियो, मौज करो’ (Eat, drink and be merry) सिद्धान्तके माननेवाले तथा केवल भोजनके लिए इस संसारमें जीनेवाले लोग ही प्रायः मोटे देखे जाते हैं।
यह सर्वविदित है कि मोटे व्यक्तिको सामाजिक जीवनमें पग-पगपर अनेक कठिनाइयोंका सामना करना पड़ता है। अपनी स्थूल कायाके कारण न केवल उसे चलने-फिरने, बस, ताँगा, रिक्शा आदिमें यात्रा करनेमें ही कष्ट उठाना पड़ता है और तमाशा बनना पड़ता है, बल्कि जनसाधारणके ताने भी सुनने पड़ते हैं। मोटे आदमियोंको लक्ष्य करके कितनी ही व्यंग्योक्तियाँ और चुटकुले प्रचलित हैं। बेचारोंका नाम ही ‘मोटूराम,’ ‘मोटूमल,’ ‘मोटल्ला’ तथा ‘भैसा’ आदि रख दिया जाता है। और तो और, मन्द बुद्धिके व्यक्तियोंको ‘मोटे दिमाग’ या ‘मोटी अक्ल’ की भी संज्ञा दी जाती है।


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