Rasendra Sar Sangrah (रसेन्द्रसारसंग्रह)
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| Author | Dr. Indra Deva Tripathi |
| Publisher | Chaukhamba Orientalia |
| Language | Hindi & Sanskrit |
| Edition | 2022 |
| ISBN | 978-81-7637-214-5 |
| Pages | 514 |
| Cover | Paper Back |
| Size | 14 x 3 x 22 (l x w x h) |
| Weight | |
| Item Code | CO0048 |
| Other | Dispatched in 1-3 days |
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रसेन्द्रसारसंग्रह (Rasendra Sar Sangrah) यह ग्रन्थ सोलीं शताब्दी में उड़ीसा के आचार्य गोपाल कृष्ण भट्ट के द्वारा लिखा गया था। यह ग्रन्थ पाँच अध्यायों में परिपूर्ण हैं।
प्रथम अध्याय में रस पर्याय, उसके लक्षण, दोष, शोधन, अष्टसंस्कार, हिङ्गुलाकृष्ट रस (मूच्र्छना), रस/सन्दूर, रस कर्पूर, रस भस्म के प्रकार (कृष्ण, रक्त, श्वेत, पीत) तथा कुछ परिभाषायें – रसमारक वर्ग, नियामक वर्ग, शोधन वर्ग, रक्त वर्ग, पीत वर्ग, द्रावक वर्ग, मूत्र वर्ग, अग्ल वर्ग, लवणवर्ग, क्षार वर्ग, रससेवन में पथ्यापथ्य, उपरस वर्ग (बीस द्रव्यों का वर्ग), इनके भेद, लक्षण, शोधन, मारण एवं गुणों का वर्णन है। रसमाणिक्य निर्माण की विधि, स्वर्णादि घातुयें एवं मणिमुक्तादि रलों का मेद, लक्षण, शोधन, मारण एवं गुणों का वर्णन उपलब्ध है। विषोपविष द्रव्यों का शोधन, नानाविधि द्रव्यों के शोधन में जलौका, वृद्ध दारुकादि द्रव्यों का शोधन भी वर्णित है। यह अध्याय मात्र ४०२ श्लोकों में परिपूर्ण है।
द्वितीय अध्याय (चिकित्सा खण्ड) में विरेकाधिकार, ज्वर चिकित्सा, अतिसार, ग्रहणी, अर्श, अजीर्ण, कृमि, पाण्डु-कामला, रक्त-पित्त, यक्ष्मा, कास, हिका-श्वास, स्त्ररमेद, अरोचक, छर्दि, तृष्णा, मूर्च्छा, मदात्यय, दाह, उन्माद, अपस्मार, वातव्याधि, कफजरोग, पित्तज रोग, वातरक्त, उरुस्तम्भ, आमवात, शूल रोग, उदावर्त-आनाह, गुल्म, हृद्रोग, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, अश्मरी, प्रमेह, सोमरोग, स्थौल्य, उदररोग, प्लीहा रोग, शोथ, अर्बुद, श्लीपद, भगन्दर, उपदंश, कुष्ठ, शीत-पित्तोदर्द, अम्लपित्त, विसर्प-विस्फोट-तन्तुक रोग, मसूरिका, क्षुद्ररोग, मुखरोग, कर्णरोग, नासारोग, नेत्र रोग, शिरोरोग, प्रदर, योनिव्यापद, सूतिका आदि ६५ रोगों का विस्तृत विवेचन एवं उनकी सफल चिकित्ता बताई गई है।
तृतीय अध्याय बालरोग चिकित्सा
चतुर्थ अध्याय विषरोग चिकित्सा
पञ्श्चम अध्याय रसायन-वाजीकरण
इस ग्रन्थ में सम्पूर्ण रोगों की चिकित्सा क्रम में रसौषधियों एवं कुछ काष्ठौषधियों के कुल ६०१ योग हैं जिसमें मात्र बीस योग काष्ठौषधियों के हैं। यद्यपि एक योग पाठभेद के कारण कभी-कभी दो-तीन बार भी पढ़ा गया है किन्तु अधिकांश स्थलों पर ऐसा नहीं हुआ है।रसेन्द्रसारसंग्रह ग्रामीण चिकित्सकों में अधिक लोकप्रिय है। अधिकतर परम्परागत आयुर्वेद के ग्रामीण चिकित्सक रसेन्द्रसारसंग्रह और भावप्रकाश से ही रोगियों की चिकित्सा करते हैं। अब तक २५ से अधिक विद्वानों ने हिन्दी में इस ग्रन्थ का अनुवाद किया है। इसी से इसकी उपयोगिता स्वतः प्रमाणित हो जाती है। अधुना रसेन्द्रसारसंग्रह कई व्याख्याओं में उपलब्ध है। वैद्य श्रीइन्द्रदेव त्रिपाठी जी ने इस ग्रन्थ में बड़ा ही परिश्रम किया है जो श्लाघ्य है। आशा है कि वैद्य त्रिपाठी जी अपनी सशक्त लेखनी से रसशाख के अन्य अनूदित ग्रन्थों का उद्धार करेंगे।












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