Rasratna Samucchaya (रसरत्नसमुच्चय:)
Original price was: ₹465.00.₹395.00Current price is: ₹395.00.
| Author | Dr. Indra Dev Tripathi |
| Publisher | Chaukhambha Sanskrit Sansthan |
| Language | Sanskrit & Hindi |
| Edition | 2023 |
| ISBN | 81-86937-46-3 |
| Pages | 454 |
| Cover | Paper Back |
| Size | 14 x 4 x 22 (l x w x h) |
| Weight | |
| Item Code | CSS0024 |
| Other | Dispatched in 1-3 days |
10 in stock (can be backordered)
CompareDescription
रसरत्नसमुच्चय: (Rasratna Samucchaya) वेदवाड्मय में आयुर्वेद का महत्वपूर्ण स्थान है। वहाँ इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है। इसकी चिकित्सा पद्धति सार्वजनीन है और प्राणीमात्र के लिए यह कल्पलता की तरह हितकर है। चिकित्सा के सम्वन्ध में कहा गया है कि चिकित्सा तृनि (वैद्य-वृष्टि) किसी भी अवस्था में निष्फल नहीं है।
क्वचिदर्शः क्वचिद् मैत्री क्वचिद् धर्मः क्वविद्यशः। क्वचिदभ्यासयोगश्च विकित्यरा नास्ति निकला।।
अर्थात् चिकित्सा से कहीं धन की प्राप्ति होती है, कहीं पैत्री होती है, कहीं धर्म होता है, कहीं पर यश मिलता है तथा कहीं-कही अभ्यास रूपी फल मिलता है. इस प्रकार चिकित्सा कभी भी निष्फल नहीं है। अतः चिकित्सा से बढ़कर कोई पुण्यतम कार्य नहीं है-चिकित्सतात्पुण्यतानं न विजित्। उपवेदाङ्गभूत अनेक आयुर्वेद के चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता, अांगडदय, बृहत्त्रयो तथा शाईचरादि लघुश्यों आदि धन्य है। अशांगहृदय के रचयिता वैद्यप्रवर वैद्यपति सिंहगुप्त के सुपुत्र वाग्भटाबार्य ने प्रस्तुत इन्ध रतरत्नसमुच्चय का प्रणयन किया। यह रसशाख का अनूठा ग्रन्थ है। इसके पहले भी रसशाख के अनेक वन्य निर्मित हुए थे जो अपने आप में प्रामाणिक साबित हुए थे।
उन सब चन्द्रसेनादि रससिद्ध आचायों के ग्रन्थों का अवलोकन करके तथा अपनी बहुमुखी प्रखर प्रतिभा के रंग में रंगकर सहज सुबोध शैली में निबद्ध करके सरत्नसमुच्चय का निर्माण किया है तथा जनोपयोगी एवं व्यावहारिक बनाने का भी पूरा प्रयास किया है। यह बात प्रस्तुत अन्य की प्रस्तावना में ही स्पष्ट है और एक प्रकार से रससिद्धयोगों का यह संग्रह ग्रन्थ है ऐसा भी वहाँ कह दिया है। यद्यपि चिकित्सोपयोगी अनेक काष्ठौषधियाँ विद्यमान थीं परन्तु रस-रसायन चिकित्सा की अपनी अलग पहिचान है फलतः रसशाख के मर्मज्ञ वैद्यों की दृष्टि में इसका बहुत महत्व है, क्योंकि एक ही रसराज शरीर को अजर-अमर बनाने में समर्थ है “एकोऽभी रसराज शरीराजरामरं कुरुते”।
यहाँ स्मरणीय है कि रस-चिकित्सा का सयर्वोपरि जनक आविष्कर्ता महादेवजी है अतः यह निकित्सा देवी है। चिकित्सा भी तीन तरह की कही गई है आसूरी, मानुषी तथा देवी। शत्रच्छेदन द्वारा चिकित्ररा आसुरी है, कषाय आदि काष्ठौषधीय चिकित्सा मानुषी है और पारद, लौह आदि निकित्सा देवी चिकित्सा कही गई है:-
आसुरी मानुषी दैवी चिकित्सा त्रिविद्या मता। शीः कषाये लोहाचेः क्रमेणान्याः सुपूजिताः।।
इसी तरह उत्तम, मध्यम तथा अधम प्रकार से चिकित्सा विविध कही गई है। लोहादि से चिकित्सा करनेवाला वैद्य उत्तम वैद्य कहा जाता है, कषायादि मूल में चिकित्सा करनेवाला वैद्य मध्यम है और शस्त्रदाहादि चिकित्सा करनेवाला वैद्य अधम कहा गया है। इससे प्रमाणित हुआ कि रस-चिकित्सा उत्तम चिकित्सा है, क्योंकि इसकी मात्रा स्वल्प होती है और उसमें अरुचि को भावना नहीं होती है, साथ ही शीघ्र ही आरोग्य प्रदान करने की क्षमता होती है। अतः सभी औषधों में रसौषध अधिक गुणकारी है, सेवनीय है।







Reviews
There are no reviews yet.