Sankshipta Astanga Hridyam (संक्षिप्त अष्टांगहृदयम् सूत्रस्थान)
Original price was: ₹175.00.₹149.00Current price is: ₹149.00.
| Author | Dr. S.V. Shukla |
| Publisher | Chaukhamba Orientalia |
| Language | Sanskrit and Hindi |
| Edition | 2022 |
| ISBN | 978-81-7637-263-3 |
| Pages | 264 |
| Cover | Paper Back |
| Size | 14 x 3 x 22 (l x w x h) |
| Weight | |
| Item Code | CO0140 |
| Other | Dispatched in 1-3 days |
9 in stock (can be backordered)
CompareDescription
संक्षिप्त अष्टांगहृदयम् सूत्रस्थान (Sankshipta Astanga Hridyam) अथ, विश्व के महानतम सम्राट भगवान श्री राम के कालखण्ड में विभिन्न आयुर्वेद संहिताओं अग्निवेश तन्त्र, सुश्रुत संहिता, काश्यप संहिता, निमितन्त्र, अगस्त्य तन्त्र (सिद्धि/रस सम्प्रदाय) आदि का प्रणयन हुआ। लगभग ५ वीं शदी (५०० ई.) में सिंधु क्षेत्र निवासी सिंहगुप्त के पुत्र, सौगतेश्वर बौद्धभिक्षु अवलोकितेश्वर के शिष्य ‘वाग्भट’ (अ.सं.उ. ५०/१३३) ने उपलब्ध प्रमुख आयुर्वेद तन्त्रों से अष्ट अंङ्ग युक्त आयुर्वेद ग्रहण कर, उसका १. समेकन (Integration), २. स्पष्टीकरण (गूढ अर्थ प्रकाशन) तथा ३ आवश्यक शास्त्र विस्तार करते हुए प्रथम, गद्यपद्यात्मक ‘अष्टाङ्ग संग्रह’ तथा तदुपरान्त पद्यमय ‘अष्टाङ्ग हृदय’ की रचना की।
[शास्त्र समृद्धन उदा०- आत्रेय/अग्निवेश तन्त्र में पञ्चधा वात, सुश्रुत संहिता में पञ्चधा पित्त तथा वाग्भट तन्त्रों में पञ्चधा कफ का नाम सहित वर्णन।
विपाक की परिभाषा/लक्षण सर्वप्रथम वाग्भट ने दिया।
नवीन औषधीय योग; संङ्गह से भी हृदय में कुछ नये योग है।]
अष्टाङ्ग सङ्गह को चरक सं. व सुश्रुत सं. के साथ वृहत्त्रयी में तथा अष्टाङ्ग हृदय को भाव प्रकाश व शारंगधर संहिता के साथ लघुत्रयी में आधुनिक वैद्यों ने स्थान दिया है। कुछ विद्वान वाग्भट (अ.स./अ.हृ.) को चरक व सुश्रुत सं. के साथ बृहत्त्रयी में तथा मा.नि., भा.प्र. व शा.सं. को लघुत्रयी में रखते हैं। अष्टाङ्ग सङ्गह व अष्टाङ्ग हृदय के प्रारंभिक अंशों में पर्याप्त समानता मिलती है, पर ग्रंथ के आगे बढ़ने के साथ-साथ स्पष्ट वैशिष्ट्य मिलने लगता है, फिर भी अनेक श्लोक समान मिल जाते हैं। ‘हृदय’ की मुख्य विशेषता है, इसका सुगेय पद्यमय होना (पद्य में प्रयुक्त छंद-स्वागता आदि, का नाम भी प्रायः उसी श्लोक में आ जाता है।) जिस कारण इसे कण्ठस्थ करना अन्य संहिताओं की अपेक्षा अधिक सुगम है।
देववाणी संस्कृत विश्व की शुद्धतम व एक मात्र वैज्ञानिक भाषा है। संस्कृत से ही स्थान, देश, वाणी अनुसार विविध भाषाएं उत्पन्न हैं; यथा-
* No न का धातु रूप ‘नो’ * Cerebrum शिरोब्रह्म
* You यूयं का वाभेद * Cerebellum शिरोविलोम
* Heart हत् * Near नियर/नियरे आदि।
श्लोकों को कण्ठस्थ करने से उनका एक प्रभाव (Impression) मस्तिष्क पर पड़ता है, जिससे उनकी स्मृति चिरस्थायी हो जाती है; अन्य किसी भाषा में यह गुण नहीं मिलता, उन्हें Computer में feed किया जा सकता है, पर Computer सर्वदा साथ नहीं होते (Computer हेतु भी श्रेष्ठतम भाषा संस्कृत है); ऐसे में एक चिकित्सक के लिये पुनः श्लोकों की आवश्यकता अनुभूत होती है।
इस दृष्टि से ‘अष्टाङ्ग हृदय’ चिकित्सा विज्ञान को मस्तिष्क रूपी प्राकृत Computer में feed करने का एक अच्छा माध्यम है। ‘अष्टाङ्ग हृदय’ का सूत्र स्थान सम्पूर्ण ग्रन्थ का बीज भाग है। इस रहस्य में सम्पूर्ण ग्रन्थ का सार सूत्रित है (अ.हृ.सू. ३०/५३)। यहाँ जो वर्णित है, आयुर्वेद के सभी ग्रन्थों में वही विस्तार से निरूपित किया गया है। अस्तु इस उत्तम सूत्र स्थान को समझना व स्मृति बद्ध रखना अति आवश्यक है।
इस ग्रन्थ में संक्षिप्तात्मक व व्याख्यात्मक (Explanatory) शैली अपनाई है। भाषा व अनुवाद में शुद्धता (Accuracy) का ध्यान रखा गया है। सामग्री का प्रस्तुतीकरण, एक दृष्टि में ही विषय स्पष्ट करने तथा मस्तिष्क पर अंकित होने में सक्षम है। अति आवश्यक श्लोकों (भावी अध्ययन व परीक्षा विषयक), चित्र व सारणियों के द्वारा विषय स्पष्ट किया गया है।








Dr Shivkumar Shete (verified owner) –
Very good 💯 book , very much useful in exams….