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Shrimad Bhagwat Maha Puranam Set of 7 Vols. (श्रीमद्भागवत महापुराणम् 7 भागो में)

6,940.00

Author Prof. Aajad Mishr 'Madhukar'
Publisher Uttar Pradesh Sanskrit Sansthan
Language Hindi & Sanskrit
Edition 4th edition
ISBN -
Pages 5247
Cover Hard Cover
Size 23 x 4 x 15 (l x w x h)
Weight
Item Code UPSS0036
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Description

श्रीमद्भागवत महापुराणम् (Shrimad Bhagwat Maha Puranam) श्रीमद्भागवत महापुराण की प्रशंसा में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाना अथवा समुद्र को अर्घ देने के समान श्रद्धा के अतिशय का केवल प्रकाशन है। अन्य अनेक पुराणों ने इसकी महिमा का गान किया है। यहाँ संस्कृत एवं हिन्दी प्रस्तावना में, ‘श्रीमद्भागवतमहापुराणमाहात्म्यम्’ शीर्षक से ग्रन्थारम्भ में प्रस्तुत पद्मपुराण उत्तर खण्ड के छह अध्यायों में तथा प्रथम श्लोक की भावार्थदीपिका टीका के अन्तिम में श्रीमद्भागवत की महिमा का ही बखान है। वस्तुतः ‘माहात्म्यम्’ शीर्षक से प्रस्तुत पद्मपुराण उत्तर खण्ड के छह अध्याय ही इस महापुराण की भूमिका है।

यह पुराण संस्कृत साहित्य का एक अनुपम ग्रन्थरत्न होने के साथ भक्तिशास्त्र का सर्वस्व है। यह निगम कल्पतरु का स्वयं गलित-फल है जिसे शुकदेव जी ने अपनी मधुर वाणी से संयुक्त कर अमृतमय बना डाला है। व्यास जी की पौराणिक रचनाओं में इसे सर्वश्रेष्ठ कहना पुनरुक्ति मात्र है। इसकी भाषा इतनी ललित है, भाव इतने कोमल तथा कमनीय हैं कि ज्ञान तथा कर्मकाण्ड की सतत सेवा से ऊसर मानस में भी यह भक्ति की अमृतमय सरिता बहाने में समर्थ होता है। वैष्णव धर्म के अवान्तर-कालीन सभी संप्रदाय भागवत के ही अनुग्रह के विकास हैं, विशेषतः वल्लभ संप्रदाय तथा चैतन्य संप्रदाय जो उपनिषद्, भगवद्‌गीता तथा ब्रह्मसूत्र जैसे प्रस्थानत्रयी के साथ-साथ भागवत को भी अपना उपजीव्य मानते हैं। वल्लभाचार्य जी भागवत को महर्षि की ‘समाधि-भाषा’ मानते हैं-

वेदाः श्रीकृष्णवाक्यानि व्याससूत्राणि चैव हि। समाधिभाषा व्यासस्य प्रमाणं तच्चतुष्टयम्।। (शुद्धाद्वैत मार्तण्ड)

जिन परम तत्त्वों की अनुभूति व्यासदेव को समाधि दशा में हुई थी उन्हीं का विशद प्रतिपादन भागवत में किया गया है। वल्लभ तथा चैतन्य के सम्प्रदायों को अधिक सरस, रसस्निग्ध तथा हृदयावर्जक होने का यही रहस्य है कि उनका मुख्य उपजीव्य ग्रन्थ है– श्रीमद्भागवत। भागवत की भाषा इतनी ललित है, इतनी सरस है कि वह पाठकों और श्रोताओं के हृदय को बलात् आकृष्ट कर आनन्द-सागर में डुबा देती है। उसमें सरस गेय गीतियों की प्रधानता है, परन्तु भागवत की स्तुतियाँ आध्यात्मिकता से इतनी परिप्लुत हैं कि उनको बोधगम्य करना विशेष शास्त्र मर्मज्ञों की ही क्षमता की बात है। इसीलिए पंडितों में प्रचलित सूक्ति है-

धनञ्जये हाटकसम्परीक्षा रणाजिरे शस्त्रभृतां परीक्षा। विपत्तिकाले गृहिणीपरीक्षा विद्यावतां भागवते परीक्षा।।

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