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Sukti Sagar (सूक्ति सागर)

265.00

Author Ramashankar Gupta
Publisher Uttar Pradesh Hindi Sansthan
Language Hindi
Edition 7th edition, 2015
ISBN 978-93-82175-62-9
Pages 871
Cover Paper Back
Size 14 x 5 x 21 (l x w x h)
Weight
Item Code UPHS0042
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Description

सूक्ति सागर (Sukti Sagar) सुक्तियाँ साहित्य-गगन में देदीप्यमान उज्वल नक्षत के समान हैं। इनकी आभा देश और काल की संकुचित सीमा पार करके सर्वदा एक समान और एक रस रहने वाली है। मानव जीवन के विविध क्षेत्रों में सहस्रों वर्षों की अनुभूतियों ने इनको अमरता प्रदान की है और करोड़ों कण्ठों से निकलने के कारण इनमें माधुर्य और कोमलता का यथेष्ट परिपाक हुआ है। ये सूक्तियाँ यदि न हों तो साहित्य में रस की कोई स्थिति ही न रहे और कविता, कहानी, उपन्यास, निबन्ध और वक्तृता की कला विफल हो जाय। दस-बीस वाक्यों को ही नहीं, पूरे पृष्ठ और संदर्भ को भी सजीव बनाने की इनमें अद्भुत क्षमता होती है और वक्तृत्व कला को चमकाने में ये तो अपनी अद्वितीय स्थिति रखती हैं। बहुधा लेखकों, कवियों एवं साहित्यकारों के समान ही इनकी आवश्यकता सामाजिक कार्य करने वालों को एवं राजनीतिज्ञों को भी हुआ करती है तथा महापुरुषों, उपदेशकों एवं कथावाचकों के समान ही गृहस्थी के विभिन्न झंझट में रहने वाले लोगों को भी इसकी आवश्यकता पड़ती है। मानव जीवन का ऐसा कोई कोना बचा हुआ नहीं है, जिस पर अमर सूक्तियों के कण अमृत के समान शोलता एवं प्रेरणा प्रदान करने की शक्ति न रखते हों और संसार की ऐसी कोई जटिल समस्या नहीं है, जिसको बात-की-बात में सुलझाने की सूझ इनसे न मिलती हो।

अनेक प्राचीन साहित्यकारों के सम्बन्ध में ऐसी किंवदन्तियाँ प्रसिद्ध हैं कि उनकी किसी एक सूक्ति से बड़े-बड़े अनर्थ एवं दुर्घटनाएँ रुक गयी हैं और निविड़ अन्धकार में भी पथ का प्रदर्शन हुआ है। यही नहीं, केवल एक सूक्ति को ही लाखों सुवर्ण मुद्राओं में क्रय करने की मनोहर किंवदन्तियाँ भी पायी जाती हैं और उनके द्वारा क्रय करने वाले का सर्वविधि कल्याण भी सुना जाता है। तात्पर्य यह है कि ये सूक्तियाँ अमूल्य रत्न हैं और उनकी आवश्यकता प्रत्येक सहृदय को सर्वदा पड़ा करती है।

सूक्तियों में शिक्षा एवं सदुपदेश की जितनी अमोघ शक्ति रहती है उतनी ही आत्ममंथन एवं अनुभूतियों को झंकृत करने की भी इनमें क्षमता होती है। सग्रंथों के सैकड़ों पृष्ठ अथवा किसी सदुपदेशक के घंटे दो घंटे के मनोहर व्याख्यान भी उतना प्रभाव नहीं डालते जितना गम्भीर प्रभाव किसी एक सूक्ति का हमारे हृदय पर पड़ता है। इसका कारण यह है कि सूक्तियों का प्रभाव सीधे हृदय पर पड़ता है। कर्णकुहरों में पड़ते ही ये विद्युत तरंगों की भाँति समूचे शरीर की अन्तरात्मा को विमुग्ध कर लेती हैं। मानस की गहराई में व्याप्त आनन्द की लहरों को उद्वेलित बना देती हैं और क्रियत्क्षणों के लिए ऐसा ज्ञात होने लगता है कि हृदय को ब्रह्मानन्द का साक्षात्कार हो रहा है और अकस्मात् बहुत दिनों तक सँजोकर रखने योग्य कोई बहुमूल्य मणि मिल गयी है। ऐसी अद्भुत एवं विचित्न शक्ति से भरी हुई इन सूक्तियों पर आदिम काल से सहृदयों की लोलुप दृष्टि रही है और अधिक से अधिक इन बहुमूल्य रत्नों की माला से अपने कण्ठ को अलंकृत करने की इच्छा भी सदा से पायी जाती है।

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