Tattva Anusandhanam (अद्वैतचिन्ताकौस्तुभसहितम् तत्त्वानुसन्धानम्)
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| Author | Pt. Gajanan Shastri Musalgaukar |
| Publisher | Dakshinamurty Math Prakashan |
| Language | Sanskrit & Hindi |
| Edition | 1994 |
| ISBN | - |
| Pages | 424 |
| Cover | Hard Cover |
| Size | 14 x 2 x 22 (l x w x h) |
| Weight | |
| Item Code | dmm0062 |
| Other | Dispatched in 1-3 days |
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अद्वैतचिन्ताकौस्तुभसहितम् तत्त्वानुसन्धानम् (Tattva Anusandhanam) परम पुरुषार्थ मोक्ष की अभिलाषा किसे नहीं रहती? क्योंकि मोक्ष की प्राप्ति होने पर यह जीव पुनः जनन-मरण के चक्र में नहीं फँसता। इसी आशय को श्रुति/स्मृतियों एवं पुराणों में भी बताया गया है। ‘न स पुनरावर्तत्ते’, ‘यद् गत्वा निवर्तन्ते’, ‘अनावृत्तिः शब्दात्’ इत्यादि। अतएव अधिकारी ज्ञानी पुरुष मोक्षप्राप्ति के लिये ही प्रयत्नशील रहते हैं। अज्ञान निवृत्ति पूर्वक सच्चिदानन्द ब्रह्मरूप में जीवात्मा की स्थिति को ही मोक्ष कहते हैं। ब्रह्मलोक आदि की प्राप्ति होना ‘मोक्ष’ नहीं है। क्योंकि तद् यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयते एवमेवाऽमुत्र पुण्यचितोलोकःक्षीयते’- यह श्रुति बता रही है कि ब्रह्मलोक आदि लोकों का भी इस लोक के समान ही नाश होता है। ‘आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तितोऽर्जुन’- इस गीतावचन के अनुसार स्पष्ट है कि ब्रह्मलोकादि लोक भी पुनरावृत्तिमान् हैं, इसकारण उन लोकों की प्राप्ति को ‘मोक्ष’ नहीं कहा जाता। ‘मोक्ष’ की प्राप्ति तो ‘ज्ञानादेव तु कैवल्यम्’- इस वचन के अनुसार ‘आत्मज्ञान’ से अधिकारी ज्ञानी पुरुषों को ही हुआ करती है। उपासना आदि किसी अन्य कर्मों से मोक्ष प्राप्ति नहीं होती। ‘तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेतिनान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय, ज्ञानदेव तु कैवल्यम्’- आदि श्रुतियों ने मोक्षप्राप्ति में ‘साधन’ एकमात्र ज्ञान को ही बताया है। तथा ‘नास्त्यकृतः कृतेन, न कर्मणा न-प्रजया न धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः- आदि श्रुतियों ने कमर्मोपासना आदि में मोक्ष प्राप्ति की साधनता का निषेध किया है। एवं च आत्मज्ञान ही एक मात्र, ‘मोक्ष’ प्राप्ति का साधन है- यह स्पष्ट हो जाता है।
जीव और ब्रह्म को अभिन्न समझकर अपनी ‘आत्मा’ का ‘अहं ब्रह्माऽस्मि’ इत्याकारक ज्ञान को ही ‘आत्मज्ञान’ कहते हैं। एवं च ‘जीव-ब्रह्मक्यज्ञान से ही मोक्षोपलब्धि होती है। जीवब्रह्म के भेदज्ञान से मोक्ष प्राप्ति नहीं होती। क्योंकि ‘उदरमन्तरं कुरुतेऽथ तस्य भयं भवति। द्वितीयाद्वै भयं भवति इत्यादि श्रुतियों ने भेददर्शी पुरुष को भय की प्राप्ति बतायी है। तथा ‘मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति’ इत्यादि श्रुतियों ने भेददर्शी पुरुष को पुनः पुनः जन्म मरण की प्राप्ति बतायी है। ‘अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुः- इत्यादि श्रुतियों ने उस भेददर्शी पुरुष को ‘पशु’ कहा है। उसकारण ‘भेदज्ञान’ में मोक्ष की साधनता का होना कदापि संभव नहीं है। प्रत्युत उक्त श्रुतियों से तो जन्म-मरणरूप संसार की साधनता ही ‘भेदज्ञान’ में बतायी जा रही है।








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