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Vedarth Parijat Set of 2 Vols. (वेदार्थ पारिजात 2 भागो में)

1,635.00

Author Swami Katpatri Ji Maharaj
Publisher Radhakrishna Dhanuka Prakashan Sansthan
Language Sanskrit & Hindi
Edition 2022
ISBN -
Pages 3180
Cover Hard Cover
Size 21 x 5 x 28 (l x w x h)
Weight
Item Code KJM0021
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Description

वेदार्थ पारिजात 2 भागो में (Vedarth Parijat Set of 2 Vols.) वेदार्थ के जिज्ञासुओं तथा तत्त्वचिन्तक अनुसन्धाताओं के समक्ष ‘बेदार्थपारिजात’ नामक वेदभाष्य को प्रस्तुत करने की हमारी योजना है। इस भाष्य के प्रणेता अनस्तथीविभूषित सर्वतन्त्रस्वतन्त्र सनातनधर्मसमुज्जओवक प्रातःस्मरणीय पुण्यश्लोक श्री स्वामी करपात्री जी महाराज हैं। अभा वेदभाष्यभूमिका का यह प्रथम भाग प्रस्तुन किया जा रहा है। इसका द्वितीय भाग और शुक्ल यजुर्वेद का विस्तृत भाष्य शोघ्र ही विज्ञ पाठकों के समक्ष आवेगा । स्वामो जी के विषय में हमें अधिक नहीं कहना है। उनसे सभा परिचित है। त्यागी महात्मा होते हुए भा बाप काल-चक्र की विपरीत गति के कारण ह्रासोन्मुख सनातन धर्म को पुनरुज्जीवित करने के लिये निरन्तर सचष्ट रहते हैं। हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक सद्धर्म का प्रचार और प्रसार करने के लिय, अपने उपदेशामृत से भक्त जनो को आह्लादित करने के लिये इन्होंने अनेक बार यात्राएं की हैं और आस्तिक भारतोय जनों को अपनी अनोखा प्रवचन शैली से शाश्वत सनातन धर्म की ओर आकृष्ट करने में अद्भुत सफलता प्राप्त की है।

‘धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा’ इस प्रामाणिक वचन के अनुसार जगत् की स्थिति धर्म के कारण ही है। मनुस्मृति के अनुसार हमारा देश भारतवर्ष अत्यन्त प्राचीन काल से धर्मनिष्ठ होन के कारण ही सारे जगत् का गुरु बन गया था। भारत देश की भव्य प्रासाद के रूप में कल्पना कर हमें देखना चाहिये। मन्दिर या महल का निर्माण करने के लिये ईंट, बालू, सीमेन्ट और चूने की आवश्यकता पड़ती है। कन्द, मूल, फल मात्र से अपनों उदर पूति कर हमारे चिरन्तन ऋषि-मवियों ने बर्थ और काम नामक दो पुरुषार्थों की इष्टका (इंट) के रूप में परिकल्पना करके, सामान्य और विशेष धर्म की सामान्य और विशिष्ट सीमेन्ट के रूप में कल्पना का है। जसे विशिष्ट प्रकार को सामेन्ट से ईंटों को जोड़कर गगनचुम्बी दीवालें खड़ी को जाता है और उन पर सामास्थ काटि को सीमेन्ट से पलस्तर चढाया जाता है, उसी प्रकार सामान्य और विशेष धर्म की सहायता से यह भव्य प्रासाद खड़ा होता है। चूने से सफदा कर स्थूल प्रासाद को सजाया जाता है, उसो तरह से मोक्ष रूपा सुधा से इस प्रासाद का सजाकर हमारे पूर्वजों ने हम सौंपा है। इस प्रकार यह भारतवर्ष रूपो भव्य प्रासाद धर्म, अर्थ, काम और माक्ष नामक चार पुरुषाथ। से वना है। केवल अर्थ और काम के ही सहारे चलने वाले देशों की अपेक्षा इसको विशेषता स्पष्ट है, क्योकि धम से नियन्त्रित अर्थ और काम को ही यह देश मान्यता देता है।

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