Yagya Vidhanam (यज्ञ विधानम्)
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| Author | Ramanand |
| Publisher | Pilgrims Publication |
| Language | Hindi |
| Edition | 1st edition, 2017 |
| ISBN | 978-93-5076-162-5 |
| Pages | 96 |
| Cover | Paper Back |
| Size | 14 x 1 x 21 (l x w x h) |
| Weight | |
| Item Code | PGP0010 |
| Other | Dispatched in 1-3 days |
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यज्ञ विधानम् (Yagya Vidhanam) ‘यज्ञ-विधान’ एक सतत स्फीयमान एवं बहुआयामी विषय है, जिसमें ‘मणौ वज्र समुत्कीर्णे सूत्रस्येव’ में गति है। यज्ञ का समस्त विधान उत्कर्ष को केन्द्र में रखकर किया जाता है। कुछ आधुनिक विद्वान् यज्ञ-विधान को प्राचीन सामाजिक जीवन का संक्षिप्त निदर्शन मानते हैं।
यद्यपि इस प्रकार निदर्शन यज्ञ-विधि का प्रयोजन नहीं है, तो भी उसके अनुशीलन से अवश्य ही तत्कालीन समाज पर प्रकाश पड़ता है। वह समाज मुख्यतया आरण्यक और ग्रामीण प्रतीत होता है। यज्ञ के उपादान प्रायः आरण्यक प्रकृति से लिये गये हैं। लकड़ियों को रगड़ कर अग्नि का उत्पादन अग्नि का घर में निरन्तर संरक्षण, मिट्टी की कच्ची और पकाई हुई ईंटों का निर्माण जिनका प्रयोग यज्ञशाला के अंदर वेदी में होता है। लकड़ियों और मिट्टी से घर और यज्ञशाला का निर्माण, लकड़ी काटना और उससे नाना प्रकार के उपकरणों का निर्माण, उपकरणों और आयुधों का निर्माण, धातुओं का सीमित प्रयोग जिनमें ताँबा और लोहा प्रधान है, घास और कुश को काट कर संग्रह करना; अनेक प्रकार के तृणों का संग्रह करना, पशुपालन और कृषि।
अरण्य से नाना प्रकार की घासों के अतिरिक्त वृक्षों की लकड़ी का व्यापक प्रयोग मिलता है। कुल्हाड़ी से लकड़ी काटी जाती थी और अनेक प्रकार के कारीगरी के धातुयुक्त उपकरणों से बढ़ईगिरी का कार्य विस्तृत और परिष्कृत रूप से प्रचलित था। लकड़हारे (दार्वाहार) के अतिरिक्त बढ़ई (तज्ञा) विशेषज्ञ शिल्पी था, जो कि नाप-जोख (मान) और नाना प्रकार के रूप-विधान में दक्ष था। आरण्य और ग्राम्य-पशुओं का विभाग किया जाता था। ग्राम्य-पशु ही जीवनोपयोगी थे। पशु-चारण और खेती जीविका के मुख्य साधन थे। मृगया या आखेट का यज्ञ में कहीं भी प्रतिरूपण नहीं होता है।







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