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Yoga Vasistha Set of 2 Vols. (योगवासिष्ठ 2 भागो में)

1,500.00

Author -
Publisher Khemraj Sri Krishna Das Prakashan, Bombay
Language Hindi
Edition 2023
ISBN -
Pages 1916
Cover Hard Cover
Size 14 x 8 x 22 (l x w x h)
Weight
Item Code KH0043
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Description

योगवासिष्ठ 2 भागो में (Yoga Vasistha Set of 2 Vols.) हे पाठकगण ! उस सच्चिदानन्द परब्रह्म को हम कोटिशः धन्यवाद देते हैं कि, जिसने वेदान्तसिद्धांत वाक्यरूप कतरनियों से हमारा मायाजाल कतरकर उद्धार किया है और आनन्दमय अपना धाम दरशाया है। अहो! उस दयालु प्रभु की दयालुता को हम कैसे वर्णन कर सकते हैं कि, जिसने चौरासी लक्ष योनियों में भ्रमते हुए हम लोगों को मनुष्य शरीर दिया, फिर भी हमारा अज्ञान नष्ट करने के लिये वेदान्तशास्त्र प्रकट किया। हाय! इतने पर भी हम न समझे तो हमारी ऐसी मूर्खता है कि, जैसे हथेली पर आया हुआ अमृत अज्ञान से त्याग देना और खाना नहीं।

अब प्रकृत का अनुसरण करते हैं कि, उसी वेदांतसिद्धांत शास्त्र में यह एक ग्रन्थ योगवासिष्ठ है जिसे कि महर्षि वाल्मीकिजी ने निर्माण किया है और वसिष्ठजी महाराज ने रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजी के प्रति उपदेश किया है। अहो! इस ग्रन्थ की शैली को क्या अन्य ग्रन्थ प्राप्त हो सकता है? कदापि नहीं, कि जिसमें वेदान्त के गूढ पदार्थ कथारूप करके ऐसी सरलरीति से दर्शाय है मानो करतल में आमलक। अब इस आबालवृद्ध विख्यात अतिअवदात ग्रन्थ की अविज्ञात ग्रन्थ के समान प्रशंसा करनी उचित न समझकर इस भाषायन्य के विषय में लिखता हूँ कि, यह योगवासिष्ठ भाषा ग्रन्थ ऐसा कदापि न जानना चाहिये कि, अज्ञान भ्रम को दूर नहीं कर सके, यह अवश्य ही अज्ञान भ्रम को दूर करता है क्योंकि, किसी महात्मा ने युक्ति के साथ कहा है. जैसे किः-

दोहा-ब्रह्मरूप अहि ब्रह्मवित, ताकी वाणी वेद ।
भाषा अथवा संस्कृत, करत भेद भ्रम छेद ॥१॥

इसलिये जब अन्य ब्रह्मज्ञानीजनन की भाषावाणी भी अज्ञान दूर करने के लिये वेदरूप है तो फिर महर्षि वाल्मीकिजी के ग्रन्थ के भाषानुवाद का तो कहना ही क्या है। यद्यपि यह ग्रन्थ अक्षरार्थानुरूप अनुवादित नहीं किया गया किंतु कयानुरूप अनुवादित किया गया है तथापि इसके कथा दृष्टांतो को दाष्र्टातिकों पर ऐसा समेटा है कि, मानो सागर का जल गागर में भर लिया है। इसका कथानुरूप अनुवाद होना का कारण भिन्न भिन्न प्रकार से सुना जाता है। कोई तो कहते हैं कि कोई महात्मा कहीं योगवासिष्ठ की कथा श्रवण करके आया करते और अति दयालुता से मुमुक्षुजनों के हितार्य उतनी ही कथा को कण्ठ से लिखा लिया करते थे, और कोई ऐसा कहते हैं कि, अब से १०० वर्ष पूर्व पंजाब देश के अन्तर्गत सर्वविज्ञात पटियाला नामक राजधानी में श्रीसाहबसिंह नाम वाले राजा हुए उनकी दो बहिनें विधवायें थीं। उनकी अद्वैतमत में अत्यंत निष्ठा थी इसलिये वेदान्तशास्त्र की ही कया श्रवण किया करती थीं। एक समय निरंजनी साधु रामप्रसादजी के मुख से इन्होंने इस योगवासिष्ठ की कथा श्रवण करी पश्चात् वेदांतसिद्धान्त का प्रकाश सूर्यरूप इस ग्रन्थ को समझकर इन्होंने विचार किया कि, यह उत्तम ग्रन्थ देववाणी में होने से सर्वोपयोगी नहीं इसलिये इसकी भाषा कराकर हम ऐहलौकिक यश और पारलौकिक कल्याण को प्राप्त होवें ऐसा विचारकर फिर उसी (उक्त) साधु से कवा का प्रारंभ कराया और दो पंडित लिखने के वास्ते बैठा दिये, जैसे जैसे ये साधु कथा का व्याख्यान करते गये वैसे वैसे ही पंडित लिखते गये।

आशय यह कि, व्याख्यानरूप यह योगवासिष्ठ की सम्पूर्ण कथा पंजाबीमिश्र हिन्दीभाषा में लिखी गयीं और दोनों पुस्तकों का मिलान कर एक शुद्ध प्रति बनायी गयी। पश्चात् अति उत्तम होने के कारण शीघ्र ही यह ग्रन्थ सब देशों में प्रचलित हो गया। इन पूर्वोक्त उपकारपरायणों को हम कोटिशः धन्यवाद देते हैं कि, जिन्होंने परलोक सुखसाधन भूत यह ग्रन्थ प्रचलित करके परम उपकार किया। इस ग्रन्थ के वेराग्य आदि षट् (६) प्रकरण हैं उनमें उस उस नामवाले प्रकरण में उस उस विषय का ऐसा वर्णन किया है कि, मानों साक्षात् मूर्त्तिमान् वह विषय उपस्थित है। इस प्रकार वेदान्तसिद्धान्त इसमें ऐसा दर्शाया गया है कि, जिसका श्रवण मनन और निदिध्यासन करने से अवश्य ही मनुष्य प्रपंचजाल से छूटकर मोक्षपद का भागी हो जाता है। इस ग्रन्थ की पंजाबी मिश्रित हिन्दी भाषा को विशुद्ध हिन्दी में करने का आग्रह बहुत दिनों से पाठकगण कर रहे थे।

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