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Gandhi : Ek Rajnaitik Adhyayan (गाँधी : एक राजनैतिक अध्ययन)

25.00

Author Acharya J. B. Kriplani
Publisher Sarva Sewa Sangh Prakashan
Language Hindi
Edition 6th edition
ISBN -
Pages 76
Cover Paper Back
Size 14 x 2 x 22 (l x w x h)
Weight
Item Code SSSP0039
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Description

(Gandhi Ek Rajnaitik Adhyayan) मेरी इस पुस्तक के सारे लेख ‘विजिल’ में क्रमशः प्रकाशित हुए थे। गांधीजी की रचनात्मक योजनाओं में सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक समुत्थान का मूल निहित है, परन्तु लोग आज इनकी उपेक्षा करने लगे हैं और यदि उन्हें कार्यान्वित करने की कोशिश भी होती है, तो यह गांधीजी की नीति और शिक्षा के बिलकुल विपरीत ही। इस अप्रिय स्थिति को साफ करने के लिए ही मैंने ये लेख लिखे थे।

अनेक बड़े लोगों का कहना है कि गांधीजी की योजनाओं को समुचित रूप देने के लिए गांधी जैसे ही नैतिक और आध्यात्मिक महापुरुष की जरूरत है, न कि साधारण राजनीतिज्ञों की। यहाँ मैंने सिद्ध किया है कि गांधीजी केवल नैतिक और आध्यात्मिक सुधारक ही नहीं, बल्कि एक ऐसे ‘राजपुरुष’ स्टेट्समैन) थे, जिन्होनें भारत की राजनीति और अर्थशास्त्र को ठीक तरह से समझ कर उनके समाधान के लिए समुचित उपाय भी बताया। मैंने यह भी दिखाया है कि यदि गांधीजी कुशल और चतुर राजनीतिज्ञ न होते, तो अपने सारे अध्यात्म और नैतिक बल के बावजूद वे भारत को स्वतंत्र न करा सके होते और न हमारे ‘राष्ट्र-पिता’ कहलाने के ही हकदार हुए होते।

मैं नहीं जानता कि लोग मेरे इन विचारों से कहाँ तक सहमत होंगे। मैं जानता हूँ कि केवल अपढ़ लोग ही नहीं, बल्कि पढ़े-लिखे और सुशिक्षित लोग भी गांधीजी को हर तरह से हिन्दुओं के देवालय में बैठाने की कोशिश करते हैं। उनके नाम पर मंदिरबनाये जाते हैं। उनकी जन्म और निर्वाण की तिथियाँ भी रामनवमी और जन्माष्टमी के समान ही मनायी जाती हैं। इन अवसरों पर चरखे को, जो गांधीजी की आर्थिक योजनाओं का समष्टिकारक है, चंद घण्टे उनकी याद में प्रतीक रूप से चलाकर यज्ञ की पूर्णाहुति कर दी जाती है।

गांधीजी महानतम सुधारक एवं क्रांतिकारी थे। अपनी सारी राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक योजनाओं को उन्होंने इस चरखे में केन्द्रभूत किया था और आज यदि साम्पत्तिक उत्पादन का यह श्रेष्ठ साधन उनकी स्मृति में गोदामों से निकल कर एकाध घण्टे चलनेवाला केवल एक धार्मिक प्रतीक रह गया, तो मैं समझाता हूँ कि देश का दुर्भाग्य निश्चित है। इसी वर्ष ३० जनवरी को अहमदाबाद में गांधीजी के निर्वाण-दिवस पर मुझे ऐसे ही समारोह में भाग लेना पड़ा था। देश के राजनैतिक नेता, प्रादेशिक तथा केन्द्रीय मंत्री, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में भाग लेने के लिए एकत्र हुए थे। वे सभी साबरमती के चरखा-यज्ञ में शामिल हुए। हममें से कुछ तो अपना चरखा लाये थे और शेष लोगों को सरंजाम-कार्यालय से दिया गया।

हम लोगों को एक ऊँची वेदी पर बैठाया गया। स्वभावतः, सबके मध्य में प्रधानमंत्री को रखा गया था। फोटो लेनेवालों के कैमरे प्रतिक्षण खट-खट के साथ तस्वीरें खींच रहे थे। हममें से कुछ लोग तो सूत निकालने के बजाय रूई खराब कर रहे थे। मुझे आश्चर्य तो यह हुआ कि क्या इस अवसर पर उस पुण्य-कार्य का, जिसे गांधीजी ने जनता की आर्थिक समुन्नति के लिए प्रस्तुत किया था, इसी तरह उपहास होना चाहिए? यह तो एक अच्छा-खासा मेला था। ग्रामोफोन पर बापूजी के भाषणों के तवे बज रहे थे, लेकिन इतना शोरगुल हो रहा था कि उन्हेंसुनना तो कौन कहे, बहुतों को इसका पता भी न चला। हम, खासकर हिन्दू लोग, इसी तरह अपने अवतारों की जयन्तियाँ मनाया करते हैं।

क्या हम गांधीजी को भी एक ऐसा ही अवतार बना देंगे, जिसकी मूर्ति मंदिरों में रखी जायेगी और जिसकी जयन्तियाँ मेलों में मनायी जायेंगी? क्या गांधीजी की सामाजिक या आर्थिक योजनाएँ केवल उनकी जयन्तियों के अवसर पर हरिजन सेवा और चरखा-यज्ञ के रूप में प्रतीक मात्र रह जयेंगी? आज बहुत से कांग्रेसी नेता, यदि वे अपने लाभप्रद धंधों की धुन में भूल नहीं गये हैं, तो चरखा चलाना तो जानते ही हैं, लेकिन एक समय आयेगा, जब बापू का चित्र और एक चरखा ताक में पूजा के लिए रखा जायेगा; जैसे कि सभी अवतार और देवताओं की उनके वाहनों के साथ उपयुक्त अवसरों पर पूजा होती है। गांधीजी सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक क्रांतिकारी थे। उनकी योजनाएँ राजनैतिक प्रचार, विज्ञापन या नुमाइश अथवा व्यक्तिगत उद्धार के लिए ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र के स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए थीं। परन्तु इस तरह की पूजा से हम गांधीजी के प्रभाव को बिलकुल मिटा देंगे। यदि हमें एक राष्ट्र के समान जीवित रहना है तो अपने महानतम नेता की ऐसी भ्रामक पूजाओं को रोक देना चाहिए। हमारे हिन्दू मंदिरों में देवता और अवतारों की कमी नहीं है। गांधीजी को तो इनसान ही बना रहने देना है, जिन्होंने जीवन में नैतिक पराकाष्ठा को व्यवहृत करके दिखाया है।

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