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Kushakandika Rahasya (कुशकण्डिका रहस्य)

42.00

Author Dr. Ramamilan Mishra
Publisher Shree Vedang Sansthan Prayagraj
Language Hindi & Sanskrit
Edition 2017
ISBN 978-81-935160-6-5
Pages 104
Cover Paper Back
Size 14 x 4 x 22 (l x w x h)
Weight
Item Code SVS0009
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Description

कुशकण्डिका रहस्य (Kushakandika Rahasya) कर्मकाण्ड क्षेत्र में जो भी देवाराधन यज्ञ-यागादि क्रियाएं होती हैं, उनकी पूर्णता हेतु तथा संबंधित प्रधान देव एवं आवाहित देवताओं की प्रसन्नता के लिए कर्म के अन्त में हवन अवश्य किया जाता है। कर्मकाण्ड की क्रियायें वेद-मंत्रों पर आधारित हैं यह सर्वविदित है, क्योंकि कर्मकाण्ड ही वेद का वृहत्तर भाग है। अतः कर्मकाण्ड कराने वाले विद्वान् को वेद का ज्ञान अति आवश्यक है, इसके साथ ही इस कर्म के सम्पादन हेतु कर्मकाण्ड में की जानेवाली क्रियाओं का क्रमबद्ध ज्ञान तथा दक्षता भी मंत्र ज्ञान से कम आवश्यक नहीं है, क्योंकि यदि आपके पास कोई वस्तु या वस्तु का ज्ञान है, और उसका प्रयोग कहाँ कैसे किया जाय यह ज्ञान नहीं है तो उस वस्तु या ज्ञान के रहने न रहने से क्या लाभ? अतः मंत्रज्ञान से भी अधिक क्रियाओं का ज्ञान आवश्यक है।

वैसे तो कर्मकाण्ड की क्रियायें सामान्यतः सरल ही प्रतीत होती हैं, तथा पण्डितों के लिए सुगम भी हैं, किन्तु हवन के पूर्व किया जाने वाला कर्म जो कुश कण्डिका नाम से जाना जाता है, वह पण्डितों के कसौटी का विषय आज भी बना हुआ है। बड़े-बड़े विद्वान् भी कुश-कण्डिका की क्रियाओं से अल्पज्ञ या अनभिज्ञ प्रायः देखे जाते हैं, कुछ विद्वान् तो ऐसे भी होते हैं जो कुशकण्डिका क्रिया को गौड़ रूप में रखते हुये मनमानी तरीके से कुण्ड के चारों ओर यथेच्छ कुशों का परिस्तरण करते हुए उसकी अन्य महत्वपूर्ण क्रियाओं को भी त्यागकर अग्नि स्थापित करके हवन प्रारम्भ कर देते हैं किन्तु कुछ दिग्गज ऐसे भी होते हैं जो कि कुश कण्डिका के झंझट में फंसना ही नहीं चाहते, तथा अग्नि जलाकर सीधे हवन करने लगते हैं। आज कल यह स्थिति अधिक ही देखी जाती है, जबकि पारस्कर गृह्यसूत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि – “एष एव विधिर्यत्र क्वचिद्धोमः” अर्थात् कुशकण्डिका पूर्वक ही हवन की सामान्य विधि है, जो कि इस उपरोक्त उक्ति के पहले की पंक्तियों को पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है। प्रस्तुत वाक्य में प्रयुक्त ‘क्वचित्’ शब्द का अभिप्राय लोग यह मानते हैं कि यह विधि (कुशकण्डिका की क्रिया) की जा सकती है, न भी करें तो भी हवन कर सकते हैं, किन्तु यह तर्क संगत नहीं है। यहाँ पर क्वचित् शब्द का अभिप्राय शांतिक पौष्टिक किसी भी प्रकार के छोटे या बड़े हवन में यह विधि ही है इसके अतिरिक्त नहीं, यह मानना चाहिए, ऐसा गदाधर भाष्य में भी कहा गया है।

अतः इससे स्पष्ट होता है कि हवन के पूर्व कुशकण्डिका की उतनी ही आवश्यकता है जितनी आवश्यकता हवन की। अतः इस क्रिया का लोप करना या इसका ह्रास करना सर्वथा शास्त्र विरुद्ध कार्य माना जायेगा। अतएव कुश कण्डिका की क्रियाओं को हवन के पूर्व विधिवत् सम्पादित करते हुये हवन करना चाहिए, जिससे हवन का पूर्ण फल मिल सके तथा जिस कार्य विशेष के निमित्त हवन किया जा रहा है उसकी सिद्धि हो सके।

कुश कण्डिका को पूर्ण रूप से तथ्यतः समझा जा सके, इस उद्देश्य से इस पुस्तक को आप तक पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है। इसमें कुश कण्डिका के प्रत्येक बिन्दुओं पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार किया गया है तथा उसे साङ्गोपाङ्ग समझाने का प्रयास ही इसका लक्ष्य है। यथा सर्वप्रथम कुण्ड में किये जाने वाले पञ्च भू संस्कार, अग्नि स्थापन, पात्रासादन, सुव संस्कार समिध विचार एवं हवन प्रारम्भ होने तक के समस्त बिन्दुओं पर सूक्ष्म विचार करते हुये प्रतिपादित किया गया है।

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