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Jivancharya Vigyan (जीवनचर्या विज्ञान)

60.00

Author Swami Shankra Nand Sarswati
Publisher Gita Press, Gorakhapur
Language Sanskrit & Hindi
Edition 10th edition
ISBN -
Pages 320
Cover Paper Back
Size 14 x 1 x 21 (l x w x h)
Weight
Item Code GP0116
Other Code - 1955

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Description

जीवनचर्या विज्ञान (Jivancharya Vigyan) वस्तुतः सनातन परम्पराके अनुसार अपनी दिनचर्या और जीवनचर्या चलाना कोई कठिन कार्य नहीं है, इसके लिये केवल दो बातोंकी आवश्यकता होती है- एक मनमें ‘दृढ़ आस्था’, दूसरा ‘अभ्यास’। अपने यहाँ कुछ ऐसे सामान्य कर्म हैं, जो देखनेमें अत्यन्त साधारण प्रतीत होते हैं और यदि थोड़ा उनपर ध्यान दिया जाय तो उन अत्यन्त साधारण कर्मोंसे भी जीवनका महान् कार्य सम्पादित होता है। उदाहरणार्थ भोजन करनेकी प्रक्रियामें भोजन प्रारम्भ करनेके पूर्व ‘ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा’ इस मन्त्रसे आचमन करनेकी विधि है तथा ‘ॐ भूपतये स्वाहा, ॐ भुवनपतये स्वाहा, ॐ भूतानां पतये स्वाहा’- इन तीन मन्त्रोंसे तीन ग्रास निकालनेकी विधि है।

इसके अनन्तर ‘ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपानाय स्वाहा, ॐ व्यानाय स्वाहा, ॐ उदानाय स्वाहा, ॐ समानाय स्वाहा ॥’ मन्त्र बोलकर पाँच ग्रास लेनेकी विधि है। भोजनके अन्तमें ‘ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा’ मन्त्र बोलकर पुनः आचमन करनेकी विधि है। प्रारम्भके आचमनमें भोजनको अमृतका बिछावन प्रदान करते हैं। तीन ग्रास निकालकर तीनों लोकोंकी चराचर सृष्टिको तृप्त करनेकी भावना करते हैं। पाँच मन्त्रोंसे पाँच ग्रास लेकर आत्मब्रह्मकी तृप्तिके लिये पाँच आहुति अन्तःस्थलकी जठराग्निरूपी यज्ञमें प्रदान करते हैं। अन्तके आचमनद्वारा किये हुए भोजनको अमृतद्वारा आच्छादित करते हैं। इस कार्यमें एक मिनटका भी समय नहीं लगता। कार्य तो यह कितना साधारण है, परंतु भावना इसमें कितनी महान् है।

इस प्रकार वैदिक जीवनचर्या तथा दैनिकचर्यासे जीवनका विकास तथा आत्मोन्नति होना स्वाभाविक है। आजकलके भौतिक वातावरणमें सामान्यतः शास्त्रमें आस्था रखनेवाले लोग भी इन क्रिया-कलापोंके अदृष्ट लाभ अर्थात् आध्यात्मिक एवं पारमार्थिक महत्त्वके साथ दृष्ट लाभ यानी शरीर-स्वास्थ्यसे सम्बन्धित भौतिक लाभकी भी आकांक्षा रखते हैं। इस भौतिक लाभको वे वैज्ञानिक रूपमें समझना चाहते हैं।

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